शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

Deepawali

फिर से हे दीपावली
राहे देख रही माँ बाप की बुडी आँखे फिर से हे दीपावली, बरसात मै हे चत से गिरा घर मै पानी, पलंग पर बेठे बेठे रत बितायी अंधियारी आँखों से भी टपका टप टप पानी, फिर से हे दीपावली, खेत बिका, बेल भी बिक गए, बेटे ने नयी जिन्दगी पाई, डॉक्टर की नोकरी लील गयी बाप की जवानी और खेतो की हरियाली, बेटे के साथ बहु की सज गयी दुनिया सुहावनी , फिर से हे दीपावली, फटी माँ की सदी को इंतजार हे, चिथदी सी चादर भी बाप की कह रही हे कब होगी दीपावली, दो दिन बाद दीपवाली के डाकिया एक पेकेट और लिफाफा लाया, यह पड कर उसने सुनाया, फिर से हे दीपावली, बाबा काम का बोझ ज्यादा हे, गाव का पानी सूट नहीं  होता हे, रहने के लिए घर का कमरा छोटा  हे, चूल्हे का धुवा  बहु को करता हे नुकसान, गोबर की बदबू करती हे बीमार, अगली बार टाइम मिलेगा तो आयूंगा, १ हजार रूपये भेज रहा हू काम आयेगे , माँ बाप की आँखों के आंसू टपक गए , क्या यही दीपावली हे ?

1 टिप्पणी:

  1. चिटठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. आप बहुत अच्छा लिख रहे हैं, और भी अच्छा लिखें, लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
    ---

    ---
    हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

    उत्तर देंहटाएं